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वाहन चालकों के लिए जरूरी खबर: गाड़ी फिटनेस और पॉल्यूशन सर्टिफिकेट पर सरकार का नया नियम, अब प्रक्रिया होगी ज्यादा सख्त

पॉल्यूशन सर्टिफिकेट

अगर आप अब तक बिना टेस्ट सेंटर जाए फिटनेस सर्टिफिकेट या PUC (Pollution Under Control) हासिल कर लेते थे, तो अब यह सुविधा खत्म होने वाली है। केंद्र सरकार देशभर में सड़क पर चलने वाले वाहनों की जांच को लेकर नियमों को और कड़ा करने की तैयारी कर रही है। सरकार का फोकस फर्जी सर्टिफिकेट पर रोक लगाने के साथ-साथ प्रदूषण फैलाने वाले और असुरक्षित वाहनों को सड़कों से हटाने पर है।

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इसी दिशा में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने मोटर व्हीकल नियमों में बदलाव का मसौदा तैयार किया है। प्रस्ताव के तहत अब निजी वाहनों के लिए भी ऑटोमेटेड टेस्टिंग सिस्टम लागू किया जाएगा और फिटनेस या पॉल्यूशन सर्टिफिकेट जारी करने से पहले डिजिटल प्रमाण अनिवार्य होंगे। इससे वाहन जांच की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने की तैयारी है।

अब घर बैठे फिटनेस या PUC बनवाने का विकल्प खत्म

नए प्रस्तावित नियमों के लागू होने के बाद निजी वाहनों के लिए फिटनेस सर्टिफिकेट या PUC घर बैठे बनवाना संभव नहीं रहेगा। अब वाहन मालिक को अपने वाहन के साथ अनिवार्य रूप से ऑटोमेटेड टेस्ट स्टेशन (ATS) पर जाना होगा, जहां तकनीकी जांच के बाद ही सर्टिफिकेट जारी किया जाएगा।

यह व्यवस्था मौजूदा सिस्टम की तरह ही होगी, जैसा अभी कमर्शियल वाहनों के लिए लागू है। सरकार का मानना है कि इस बदलाव से फिटनेस और पॉल्यूशन सर्टिफिकेट से जुड़ी धांधली पर लगाम लगेगी और सड़कों पर सिर्फ वही वाहन चल पाएंगे जो सुरक्षा और प्रदूषण मानकों को सही मायने में पूरा करते हों।

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देशभर में ATS का मजबूत नेटवर्क तैयार

केंद्र सरकार ने वाहन जांच को पारदर्शी बनाने के लिए देशभर में ऑटोमेटेड टेस्ट स्टेशन (ATS) का नेटवर्क तेजी से तैयार किया है। फिलहाल 160 से अधिक ATS सेंटर सक्रिय हैं और आने वाले महीनों में इनकी संख्या और बढ़ाने की योजना है, ताकि वाहन मालिकों को जांच के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े।

नए नियमों के तहत 15 साल से पुराने निजी वाहनों को फिटनेस जांच के लिए इन्हीं ATS सेंटरों पर भेजा जाएगा। ऐसे वाहनों के लिए अब रजिस्ट्रेशन रिन्यूअल से पहले वैध फिटनेस सर्टिफिकेट लेना अनिवार्य होगा। इसके अलावा, वाहन को सड़क पर चलाने के लिए हर 5 साल में एक बार फिटनेस टेस्ट पास करना जरूरी रहेगा। सरकार का मानना है कि इस सिस्टम से पुराने और असुरक्षित वाहनों की पहचान आसान होगी और प्रदूषण नियंत्रण के साथ-साथ सड़क सुरक्षा में भी सुधार आएगा।

फिटनेस से पहले 10 सेकेंड का जियो-टैग्ड वीडियो अनिवार्य

प्रस्तावित नियमों में सबसे अहम बदलाव डिजिटल वीडियो प्रूफ सिस्टम को माना जा रहा है। अब फिटनेस सर्टिफिकेट जारी करने से पहले टेस्ट सेंटर को वाहन की कम से कम 10 सेकेंड की जियो-टैग्ड वीडियो रिकॉर्डिंग ऑनलाइन अपलोड करनी होगी।

इस वीडियो में वाहन की पूरी स्थिति साफ दिखाई देनी चाहिए। इसके लिए कुछ जरूरी शर्तें तय की गई हैं, जैसे:

सरकार का मानना है कि इस प्रक्रिया से बिना वाहन देखे फिटनेस पास करना, फर्जी रिपोर्ट बनाना और बैकडेटेड अप्रूवल जैसे गलत तरीकों पर पूरी तरह रोक लगेगी। साथ ही हर जांच का डिजिटल रिकॉर्ड मौजूद रहेगा, जिससे सिस्टम ज्यादा पारदर्शी और भरोसेमंद बनेगा।

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फिटनेस टेस्ट में फेल वाहन को मिलेंगे सिर्फ 180 दिन

नए नियमों के तहत यदि कोई वाहन फिटनेस टेस्ट में सफल नहीं हो पाता है, तो उसके मालिक को वाहन की मरम्मत और सुधार के लिए अधिकतम 180 दिन का ही समय दिया जाएगा। यह अवधि खत्म होते ही सिस्टम किसी भी तरह की ढील नहीं देगा।

अगर तय समय के भीतर वाहन दोबारा फिटनेस मानकों पर खरा नहीं उतरता, तो उसे सीधे End of Life Vehicle (ELV) की श्रेणी में डाल दिया जाएगा।

ELV घोषित होने के बाद इसके गंभीर असर होंगे:

सरकार का स्पष्ट कहना है कि 180 दिन की सीमा अंतिम होगी। इसके बाद न तो कोई एक्सटेंशन मिलेगा और न ही अस्थायी राहत। इस कदम का उद्देश्य पुराने, असुरक्षित और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को स्थायी रूप से सिस्टम से बाहर करना है। पॉल्यूशन सर्टिफिकेट

सरकार नियम सख्त क्यों कर रही है?

सरकार द्वारा फिटनेस और पॉल्यूशन नियमों को कड़ा करने के पीछे सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि दो गंभीर राष्ट्रीय समस्याएं हैं जिन पर लंबे समय से ध्यान दिया जा रहा है। पॉल्यूशन सर्टिफिकेट

पहली बड़ी वजह है तेजी से बढ़ता वायु प्रदूषण।
पुराने और खराब मेंटेन किए गए वाहन हवा में जरूरत से ज्यादा जहरीले उत्सर्जन छोड़ते हैं, जिससे शहरों में एयर क्वालिटी लगातार खराब होती जा रही है। सरकार चाहती है कि केवल वही वाहन सड़कों पर चलें, जो तय प्रदूषण मानकों पर खरे उतरते हों।

दूसरी चिंता है सड़क सुरक्षा।
कई पुराने वाहन तकनीकी रूप से कमजोर हो चुके होते हैं—ब्रेक, स्टीयरिंग, टायर या इंजन जैसी जरूरी चीजें हादसों का कारण बन सकती हैं। ऐसे वाहनों का सड़कों पर चलना न सिर्फ चालक, बल्कि अन्य लोगों के लिए भी खतरा बनता है।

इसी वजह से ऑटोमेटेड टेस्ट स्टेशन (ATS) में गलत रिपोर्टिंग रोकने के लिए तकनीकी सेफगार्ड जोड़े जा रहे हैं। पूरी जांच प्रक्रिया अब डिजिटल, ऑटोमेटेड और सबूत-आधारित होगी, ताकि किसी भी तरह की सेटिंग, फर्जी एंट्री या बिना जांच सर्टिफिकेट जारी करने की गुंजाइश न रहे।

सरकार का साफ संदेश है
या तो वाहन सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल हों, या उन्हें सिस्टम से स्थायी रूप से बाहर कर दिया जाए

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वाहन मालिकों के लिए इस बदलाव का क्या मतलब है?

नया फिटनेस और PUC नियम पहली बार में थोड़ा असुविधाजनक लग सकता है, क्योंकि अब बिना जांच सर्टिफिकेट मिलना संभव नहीं होगा। लेकिन लंबे समय में इसका फायदा सीधे वाहन मालिकों को मिलेगा।

इस बदलाव से सड़कों पर केवल सुरक्षित और सही हालत वाले वाहन ही चल पाएंगे, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा कम होगा। साथ ही प्रदूषण फैलाने वाले पुराने वाहनों पर भी प्रभावी रोक लगेगी।

फिटनेस और PUC सर्टिफिकेट की प्रक्रिया अब पूरी तरह जांच-आधारित और पारदर्शी होगी। आने वाले समय में सर्टिफिकेट पाना आसान नहीं, लेकिन भरोसेमंद और ईमानदार जरूर होगा।

निष्कर्ष

सरकार द्वारा फिटनेस और PUC सर्टिफिकेट से जुड़े नियमों में किया गया यह बदलाव वाहनों की वास्तविक जांच सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। भले ही इससे वाहन मालिकों को थोड़ी अतिरिक्त मेहनत करनी पड़े, लेकिन इसके जरिए असुरक्षित और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर प्रभावी नियंत्रण संभव होगा। आने वाले समय में यह सिस्टम सड़कों की सुरक्षा, साफ पर्यावरण और पारदर्शी प्रक्रिया को मजबूती देगा।

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